शक के बादलों
पर्वतो में
मत बदल जाना,
समर्पण के महल मेरे
आंसूओं में
मत पिघल जाना ।
अपने आबिद को सम्भाल-
मेरे माबूद,
मैने मुड़ के वापस नही आना ।।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें