जिस आंगन ने पाला था बचपन मेरा
उस आंगन को तन्हा ही छोड़ आये हम।
दिल से आवाज़ महफ़िल में आती है यूं,
मां के आंचल को सूना ही छोड़ आये हम।
जो लिपटती थी पैरों से हर रोज मेंरे ,
उस मिट्टी को मिट्टी में छोड़ आये हम ।
एक निवाला भी बिन मेरे न खाई जो,
उस वालिदा को भूखा ही छोड़ आये हम ।
ये नए घर, ये बंगले कमाए बहुत ,
पर सुकूं के घरौंदों को छोड़ आये हम ।
पूरी अंगनाई सजती थी परिवार से ,
वो चांदनी रात किस दौर छोड़ आये हम।
झूठी दौलत कमाने शहर आये हम,
असली दौलत को घर मे ही छोड़ आये हम।
सुमित अर्कवंशी....✍️
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